भगवान्ने विभीषणको राक्षसोंका स्वामित्व, लंकापुरीका राज्य और एक कल्पकी आयु दी और इसके बाद पहले सीताजीको विमानपर बैठाकर अपने दोनों भाई लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं सेवक हनूमान्जीके साथ स्वयं भी विमानपर सवार हुए। इस प्रकार चौदह वर्षका व्रत पूरा हो जानेपर उन्होंने अपने नगरकी यात्रा की। उस समय मार्गमें ब्रह्मा आदि लोकपालगण उनपर बड़े प्रेमसे पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ ३२-३३॥✎ 2049
यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
लंकामायुश्च कल्पान्तं ययौ चीर्णव्रतः पुरीम्।
अवकीर्यमाणः कुसुमैर्लोकपालार्पितैः पथि॥ ३३
भगवान्ने विभीषणको राक्षसोंका स्वामित्व, लंकापुरीका राज्य और एक कल्पकी आयु दी और इसके बाद पहले सीताजीको विमानपर बैठाकर अपने दोनों भाई लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं सेवक हनूमान्जीके साथ स्वयं भी विमानपर सवार हुए। इस प्रकार चौदह वर्षका व्रत पूरा हो जानेपर उन्होंने अपने नगरकी यात्रा की। उस समय मार्गमें ब्रह्मा आदि लोकपालगण उनपर बड़े प्रेमसे पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ ३२-३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 57) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/10/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)