श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.44

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

धनुर्निषंगा२ञ्छत्रुघ्नः सीता तीर्थकमण्डलुम्।

अबिभ्रदंगदः खड्गं हैमं चर्मर्क्षराण् नृप॥ ४४

dhanurniṣaṃgāñchatrughnaḥ sītā tīrthakamaṇḍalum|

abibhradaṃgadaḥ khaḍgaṃ haimaṃ carmarkṣarāṇ nṛpa|| 44

अर्थ

परीक्षित्! शत्रुघ्नजीने धनुष और तरकस, सीताजीने तीर्थोंके जलसे भरा कमण्डलु, अंगदने सोनेका खड्ग और जाम्बवान्‍ने ढाल ले ली॥ ४४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    ङ्गं शत्रु०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 58)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें