॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.11.20
नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयाऽऽत्त-
लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः।
रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः३
किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः॥ २०
nedaṃ yaśo raghupateḥ surayācñayā''tta-
līlātanoradhikasāmyavimuktadhāmnaḥ|
rakṣovadho jaladhibandhanamastrapūgaiḥ
kiṃ tasya śatruhanane kapayaḥ sahāyāḥ|| 20
अर्थ
परीक्षित्! भगवान्के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला-विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया। भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या? यह सब उनकी लीला ही है॥ २०॥
टिप्पणियाँ
- ३
स्त्रपाणेः।