श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.20

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयाऽऽत्त-

लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्‍नः।

रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः३

किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः॥ २०

nedaṃ yaśo raghupateḥ surayācñayā''tta-

līlātanoradhikasāmyavimuktadhāmnaḥ|

rakṣovadho jaladhibandhanamastrapūgaiḥ

kiṃ tasya śatruhanane kapayaḥ sahāyāḥ|| 20

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला-विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया। भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या? यह सब उनकी लीला ही है॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    स्त्रपाणेः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 62)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें