निमिकी दृष्टिमें गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था। इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि ‘आपने लोभवश अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाय’॥ ५॥
निमिः प्रतिददौ शापं गुरवेऽधर्मवर्तिने।
तवापि पतताद् देहो लोभाद् धर्ममजानतः॥ ५
निमिकी दृष्टिमें गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था। इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि ‘आपने लोभवश अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाय’॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.13.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 67) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/13/5/