श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.35

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सुदेहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया।

खादन्त्येनं वृका गृध्रास्त्वत्प्रसादस्य नास्पदम्॥ ३५

sudeho'yaṃ patatyatra devi dūraṃ hṛtastvayā|

khādantyenaṃ vṛkā gṛdhrāstvatprasādasya nāspadam|| 35

अर्थ

देवि! अब इस शरीरपर तुम्हारा कृपा-प्रसाद नहीं रहा, इसीसे तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अतः मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध खा जायँगे’॥ ३५॥✎ 2051

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2051 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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