श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.12

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यैरिदं तपसा सृष्टं मुखं पुंसः परस्य ये।

धार्यते यैरिह ज्योतिः शिवः पन्थाश्‍च दर्शितः॥ १२

yairidaṃ tapasā sṛṣṭaṃ mukhaṃ puṃsaḥ parasya ye|

dhāryate yairiha jyotiḥ śivaḥ panthāśca darśitaḥ|| 12

अर्थ

जिन ब्राह्मणोंने अपने तपोबलसे इस संसारकी सृष्टि की है, जो परम पुरुष परमात्माके मुखरूप हैं, जो अपने हृदयमें निरन्तर ज्योतिर्मय परमात्माको धारण किये रहते हैं और जिन्होंने सम्पूर्ण प्राणियोंके कल्याणके लिये वैदिक मार्गका निर्देश किया है, बड़े-बड़े लोकपाल तथा देवराज इन्द्र-ब्रह्मा आदि भी जिनके चरणोंकी वन्दना और सेवा करते हैं—और तो क्या, लक्ष्मीजीके एकमात्र आश्रय परम पावन विश्‍वात्मा भगवान् भी जिनकी वन्दना और स्तुति करते हैं—उन्हीं ब्राह्मणोंमें हम सबसे श्रेष्ठ भृगुवंशी हैं। और इसका पिता प्रथम तो असुर है, फिर हमारा शिष्य है। इसपर भी इस दुष्टाने जैसे शूद्र वेद पढ़ ले, उसी तरह हमारे कपड़ोंको पहन लिया है’॥ १२—१४॥

यह अर्थ श्लोक 12–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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