श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

हस्तग्राहोऽपरो मा भूद् गृहीतायास्त्वया हि मे।

एष ईशकृतो वीर सम्बन्धो नौ न पौरुषः।

यदिदं कूपल‌ग्‍नाया भवतो दर्शनं मम॥ २१

hastagrāho'paro mā bhūd gṛhītāyāstvayā hi me|

eṣa īśakṛto vīra sambandho nau na pauruṣaḥ|

yadidaṃ kūpalagnāyā bhavato darśanaṃ mama|| 21

अर्थ

देवयानीने प्रेमभरी वाणीसे वीर ययातिसे कहा—‘वीरशिरोमणे राजन्! आज आपने मेरा हाथ पकड़ा है। अब जब आपने मेरा हाथ पकड़ लिया, तब कोई दूसरा इसे न पकड़े। वीरश्रेष्ठ! कूएँमें गिर जानेपर मुझे जो आपका अचानक दर्शन हुआ है, यह भगवान्‌का ही किया हुआ सम्बन्ध समझना चाहिये। इसमें हमलोगोंकी या और किसी मनुष्यकी कोई चेष्टा नहीं है॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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