ययातिको शास्त्रप्रतिकूल होनेके कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट तो न था; परन्तु उन्होंने देखा कि प्रारब्धने स्वयं ही मुझे यह उपहार दिया है और मेरा मन भी इसकी ओर खिंच रहा है। इसलिये ययातिने उसकी बात मान ली॥ २३॥
ययातिरनभिप्रेतं दैवोपहृतमात्मनः।
मनस्तु तद्गतं बुद्ध्वा प्रतिजग्राह तद्वचः॥ २३
ययातिको शास्त्रप्रतिकूल होनेके कारण यह सम्बन्ध अभीष्ट तो न था; परन्तु उन्होंने देखा कि प्रारब्धने स्वयं ही मुझे यह उपहार दिया है और मेरा मन भी इसकी ओर खिंच रहा है। इसलिये ययातिने उसकी बात मान ली॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 88) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/18/23/