स्तुवन् वृत्तिं च कापोतीं दुहित्रा स ययौ पुरात्॥ २५
durmanā bhagavān kāvyaḥ paurohityaṃ vigarhayan|
stuvan vṛttiṃ ca kāpotīṃ duhitrā sa yayau purāt|| 25
अर्थ
शर्मिष्ठाके व्यवहारसे भगवान् शुक्राचार्यजीका भी मन उचट गया। वे पुरोहिताईकी निन्दा करने लगे। उन्होंने सोचा कि इसकी अपेक्षा तो खेत या बाजारमेंसे कबूतरकी तरह कुछ बीनकर खा लेना अच्छा है। अतः अपनी कन्या देवयानीको साथ लेकर वे नगरसे निकल पड़े॥ २५॥
दुर्मना भगवान् काव्यः पौरोहित्यं विगर्हयन्।
स्तुवन् वृत्तिं च कापोतीं दुहित्रा स ययौ पुरात्॥ २५
शर्मिष्ठाके व्यवहारसे भगवान् शुक्राचार्यजीका भी मन उचट गया। वे पुरोहिताईकी निन्दा करने लगे। उन्होंने सोचा कि इसकी अपेक्षा तो खेत या बाजारमेंसे कबूतरकी तरह कुछ बीनकर खा लेना अच्छा है। अतः अपनी कन्या देवयानीको साथ लेकर वे नगरसे निकल पड़े॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 88) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/25/