शर्मिष्ठाकी पुत्रके लिये प्रार्थना धर्मसंगत है—यह देखकर धर्मज्ञ राजा ययातिने शुक्राचार्यकी बात याद रहनेपर भी यही निश्चय किया कि समयपर प्रारब्धके अनुसार जो होना होगा, हो जायगा॥ ३२॥
राजपुत्र्यार्थितोऽपत्ये धर्मं चावेक्ष्य धर्मवित्।
स्मरञ्छुक्रवचः काले दिष्टमेवाभ्यपद्यत॥ ३२
शर्मिष्ठाकी पुत्रके लिये प्रार्थना धर्मसंगत है—यह देखकर धर्मज्ञ राजा ययातिने शुक्राचार्यकी बात याद रहनेपर भी यही निश्चय किया कि समयपर प्रारब्धके अनुसार जो होना होगा, हो जायगा॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 89) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/18/32/