श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.2.14

नवम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्‍निमुत्थितम्।

तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः॥ १४

evaṃvṛtto vanaṃ gatvā dṛṣṭvā dāvāgnimutthitam|

tenopayuktakaraṇo brahma prāpa paraṃ muniḥ|| 14

अर्थ

इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वनमें गया। वहाँ उसने देखा कि दावानल धधक रहा है। मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियोंको उसी अग्‍निमें भस्म करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गया॥ १४॥

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