॥ श्रीहरिः ॥
कावषेयं पुरोधाय तुरं तुरगमेधयाट्।
समन्तात् पृथिवीं सर्वां जित्वा यक्ष्यति चाध्वरैः॥ ३७
kāvaṣeyaṃ purodhāya turaṃ turagamedhayāṭ|
samantāt pṛthivīṃ sarvāṃ jitvā yakṣyati cādhvaraiḥ|| 37
अर्थ
यह कावषेय तुरको पुरोहित बनाकर अश्वमेध यज्ञ करेगा और सब ओरसे सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करके यज्ञोंके द्वारा भगवान्की आराधना करेगा॥ ३७॥
कावषेयं पुरोधाय तुरं तुरगमेधयाट्।
समन्तात् पृथिवीं सर्वां जित्वा यक्ष्यति चाध्वरैः॥ ३७
यह कावषेय तुरको पुरोहित बनाकर अश्वमेध यज्ञ करेगा और सब ओरसे सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करके यज्ञोंके द्वारा भगवान्की आराधना करेगा॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.22.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 107) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/22/37/