श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.23.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

दशलक्षसहस्राणि पुत्राणां तास्वजीजनत्।

तेषां तु षट्प्रधानानां पृथुश्रवस आत्मजः॥ ३३

daśalakṣasahasrāṇi putrāṇāṃ tāsvajījanat|

teṣāṃ tu ṣaṭpradhānānāṃ pṛthuśravasa ātmajaḥ|| 33

अर्थ

वह चौदह रत्‍नों * का स्वामी, चक्रवर्ती और युद्धमें अजेय था। परम यशस्वी शशबिन्दुके दस हजार पत्‍नियाँ थीं। उनमेंसे एक-एकके लाख-लाख सन्तान हुई थीं। इस प्रकार उसके सौ करोड़—एक अरब सन्तानें उत्पन्‍न हुईं। उनमें पृथुश्रवा आदि छः पुत्र प्रधान थे। पृथुश्रवाके पुत्रका नाम था धर्म। धर्मका पुत्र उशना हुआ। उसने सौ अश्‍वमेध यज्ञ किये थे। उशनाका पुत्र हुआ रुचक। रुचकके पाँच पुत्र हुए, उनके नाम सुनो॥ ३२—३४॥

यह अर्थ श्लोक 32–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    चौदह रत्‍न ये हैं—हाथी, घोड़ा, रथ, स्त्री, बाण, खजाना, माला, वस्त्र, वृक्ष, शक्ति, पाश, मणि, छत्र और विमान।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 111)

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