श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.23.36

नवम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नाविन्दच्छत्रुभवनाद् भोज्यां कन्यामहारषीत्।

रथस्थां तां निरीक्ष्याह शैब्या पतिममर्षिता॥ ३६

nāvindacchatrubhavanād bhojyāṃ kanyāmahāraṣīt|

rathasthāṃ tāṃ nirīkṣyāha śaibyā patimamarṣitā|| 36

अर्थ

पुरुजित्, रुक्म, रुक्मेषु, पृथु और ज्यामघ। ज्यामघकी पत्‍नीका नाम था शैब्या। ज्यामघके बहुत दिनोंतक कोई सन्तान न हुई। परन्तु उसने अपनी पत्‍नीके भयसे दूसरा विवाह नहीं किया। एक बार वह अपने शत्रुके घरसे भोज्या नामकी कन्या हर लाया। जब शैब्याने पतिके रथपर उस कन्याको देखा, तब वह चिढ़कर अपने पतिसे बोली—‘कपटी! मेरे बैठनेकी जगहपर आज किसे बैठाकर लिये आ रहे हो?’ ज्यामघने कहा—‘यह तो तुम्हारी पुत्रवधू है।’ शैब्याने मुसकराकर अपने पतिसे कहा—॥ ३५—३७॥

यह अर्थ श्लोक 35–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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