श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.29

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सृंजयं श्यामकं कंकं शमीकं वत्सकं वृकम्।

देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि॥ २९

sṛṃjayaṃ śyāmakaṃ kaṃkaṃ śamīkaṃ vatsakaṃ vṛkam|

devadundubhayo nedurānakā yasya janmani|| 29

अर्थ

उन्होंने उसके गर्भसे दस निष्पाप पुत्र उत्पन्‍न किये—वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेवजीके जन्मके समय देवताओंके नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनकदुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्णके पिता हुए। वसुदेव आदिकी पाँच बहनें भी थीं—पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेवके पिता शूरसेनके एक मित्र थे— कुन्तिभोज। कुन्तिभोजके कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेनने उन्हें पृथा नामकी अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी॥ २८—३१॥

यह अर्थ श्लोक 28–31 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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