श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अमोघं दर्शनं देवि आधित्से त्वयि चात्मजम्।

योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे॥ ३४

amoghaṃ darśanaṃ devi ādhitse tvayi cātmajam|

yoniryathā na duṣyeta kartāhaṃ te sumadhyame|| 34

अर्थ

सूर्यदेवने कहा—‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिये हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्‍न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा’॥ ३४॥

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