श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.66

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

जातो गतः पितृगृहाद् व्रजमेधितार्थो

हत्वा रिपून् सुतशतानि कृतोरुदारः।

उत्पाद्य तेषु पुरुषः क्रतुभिः समीजे

आत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु॥ ६६

jāto gataḥ pitṛgṛhād vrajamedhitārtho

hatvā ripūn sutaśatāni kṛtorudāraḥ|

utpādya teṣu puruṣaḥ kratubhiḥ samīje

ātmānamātmanigamaṃ prathayañjaneṣu|| 66

अर्थ

लीलापुरुषोत्तम भगवान् अवतीर्ण हुए मथुरामें वसुदेवजीके घर, परन्तु वहाँ रहे नहीं, वहाँसे गोकुलमें नन्दबाबाके घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन—जो ग्वाल, गोपी और गौओंको सुखी करना था—पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रजमें, मथुरामें तथा द्वारकामें रहकर अनेकों शत्रुओंका संहार किया। बहुत-सी स्त्रियोंसे विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्‍न किये। साथ ही लोगोंमें अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियोंकी मर्यादा स्थापित करनेके लिये अनेक यज्ञोंके द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया॥ ६६॥

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