इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी॥ १०॥✎ 1631
सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम्।
प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः॥ १०
इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 15) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/3/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)