न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः॥ १४
bhagavañchrotumicchāmi rājarṣestasya dhīmataḥ|
na prābhūd yatra nirmukto brahmadaṇḍo duratyayaḥ|| 14
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीषका चरित्र सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मणने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया जो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता; परन्तु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका॥ १४॥
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः।
न प्राभूद् यत्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः॥ १४
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीषका चरित्र सुनना चाहता हूँ। ब्राह्मणने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया जो किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता; परन्तु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 20) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/14/