श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.64

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना।

श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा॥ ६४

nāhamātmānamāśāse madbhaktaiḥ sādhubhirvinā|

śriyaṃ cātyantikīṃ brahman yeṣāṃ gatirahaṃ parā|| 64

अर्थ

ब्रह्मन्! अपने भक्तोंका एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधुस्वभाव भक्तोंको छोड़कर मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाशरहित लक्ष्मीको॥ ६४॥

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