श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.66

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मयि निर्बद्धहृदयाः साधवः समदर्शनाः१।

वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रियः सत्पतिं यथा॥ ६६

mayi nirbaddhahṛdayāḥ sādhavaḥ samadarśanāḥ|

vaśīkurvanti māṃ bhaktyā satstriyaḥ satpatiṃ yathā|| 66

अर्थ

जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं॥ ६६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    दर्शिनः।

    (मुद्रित पृष्ठ 27)

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