जिनके मंगलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव निर्मल हो जाता है—उन्हीं तीर्थपाद भगवान्के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है?॥ १६॥
यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः।
तस्य तीर्थपदः किं वा दासानामवशिष्यते॥ १६
जिनके मंगलमय नामोंके श्रवणमात्रसे जीव निर्मल हो जाता है—उन्हीं तीर्थपाद भगवान्के चरणकमलोंके जो दास हैं, उनके लिये कौन-सा कर्तव्य शेष रह जाता है?॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 30) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/5/16/