ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा॥ ४९॥
स कदाचिदुपासीन आत्मापह्नवमात्मनः।
ददर्श बह्वृचाचार्यो मीनसंगसमुत्थितम्॥ ४९
ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 37) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/49/