हा२रीतस्तस्य पुत्रोऽभून्मान्धातृप्रवरा इमे॥ १ ✎ 969
māndhātuḥ putrapravaro yo'mbarīṣaḥ prakīrtitaḥ|
pitāmahena pravṛto yauvanāśvaśca tatsutaḥ|
hārītastasya putro'bhūnmāndhātṛpravarā ime|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मैं वर्णन कर चुका हूँ कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे। उनके दादा युवनाश्वने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। उनका पुत्र हुआ यौवनाश्व और यौवनाश्वका हारीत। मान्धाताके वंशमें ये तीन अवान्तर गोत्रोंके प्रवर्तक हुए॥ १॥
मान्धातुः पुत्रप्रवरो योऽम्बरीषः प्रकीर्तितः।
पितामहेन प्रवृतो यौवनाश्वश्च तत्सुतः।
हारीतस्तस्य पुत्रोऽभून्मान्धातृप्रवरा इमे॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मैं वर्णन कर चुका हूँ कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे। उनके दादा युवनाश्वने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। उनका पुत्र हुआ यौवनाश्व और यौवनाश्वका हारीत। मान्धाताके वंशमें ये तीन अवान्तर गोत्रोंके प्रवर्तक हुए॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.7.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 38) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/7/1/
टिप्पणियाँ
१
युव०।
(मुद्रित पृष्ठ 38)
२
हरीत०।
(मुद्रित पृष्ठ 38)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#969 शब्दोंके बीचका स्थान: हा रीतस्तस्य → हारीतस्तस्य