श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

इति पुत्रानुरागेण स्नेहयन्त्रितचेतसा।

कालं वंचयता तं तमुक्तो देवस्तमैक्षत॥ १५

iti putrānurāgeṇa snehayantritacetasā|

kālaṃ vaṃcayatā taṃ tamukto devastamaikṣata|| 15

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार राजा हरिश्‍चन्द्र पुत्रके प्रेमसे हीला-हवाला करके समय टालते रहे। इसका कारण यह था कि पुत्र-स्नेहकी फाँसीने उनके हृदयको जकड़ लिया था। वे जो-जो समय बताते वरुणदेवता उसीकी बाट देखते॥ १५॥✎ 1637 2046

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1637 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वा-मित्र → विश्‍वामित्र
  • #2046 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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