श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.8

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सोऽनपत्यो विषण्णात्मा नारदस्योपदेशतः।

वरुणं शरणं यातः पुत्रो मे जायतां प्रभो॥ ८

so'napatyo viṣaṇṇātmā nāradasyopadeśataḥ|

varuṇaṃ śaraṇaṃ yātaḥ putro me jāyatāṃ prabho|| 8

अर्थ

हरिश्‍चन्द्रके कोई सन्तान न थी। इससे वे बहुत उदास रहा करते थे। नारदके उपदेशसे वे वरुणदेवताकी शरणमें गये और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो! मुझे पुत्र प्राप्त हो॥ ८॥✎ 1637 2046

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1637 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वा-मित्र → विश्‍वामित्र
  • #2046 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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