श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

असमंजस आत्मानं दर्शयन्‍नसमंजसम्।

जातिस्मरः पुरा संगाद् योगी योगाद् विचालितः॥ १६

asamaṃjasa ātmānaṃ darśayannasamaṃjasam|

jātismaraḥ purā saṃgād yogī yogād vicālitaḥ|| 16

अर्थ

असमंजस पहले जन्ममें योगी थे। संगके कारण वे योगसे विचलित हो गये थे, परन्तु अब भी उन्हें अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना हुआ था। इसलिये वे ऐसे काम किया करते थे, जिनसे भाई-बन्धु उन्हें प्रिय न समझें। वे कभी-कभी तो अत्यन्त निन्दित कर्म कर बैठते और अपनेको पागल-सा दिखलाते—यहाँतक कि खेलते हुए बच्चोंको सरयूमें डाल देते! इस प्रकार उन्होंने लोगोंको उद्वि‌ग्‍न कर दिया था॥ १६-१७॥

यह अर्थ श्लोक 16–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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