॥ श्रीहरिः ॥
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्।
कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत्॥ ३
naimiṣe sūtamāsīnamabhivādya mahāmatim|
kathāmṛtarasāsvādakuśalaḥ śaunako'bravīt|| 3
अर्थ
एक बार भगवत्कथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारण्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा॥ ३॥
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्।
कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत्॥ ३
एक बार भगवत्कथामृतका रसास्वादन करनेमें कुशल मुनिवर शौनकजीने नैमिषारण्य क्षेत्रमें विराजमान महामति सूतजीको नमस्कार करके उनसे पूछा॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 33) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/3/