॥ श्रीहरिः ॥
तत्राश्चर्यं मया दृष्टं श्रूयतां तन्मुनीश्वराः।
एका तु तरुणी तत्र निषण्णा खिन्नमानसा॥ ३८
tatrāścaryaṃ mayā dṛṣṭaṃ śrūyatāṃ tanmunīśvarāḥ|
ekā tu taruṇī tatra niṣaṇṇā khinnamānasā|| 38
अर्थ
मुनिवरो! सुनिये, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा। वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी॥ ३८॥✎ 1954
तत्राश्चर्यं मया दृष्टं श्रूयतां तन्मुनीश्वराः।
एका तु तरुणी तत्र निषण्णा खिन्नमानसा॥ ३८
मुनिवरो! सुनिये, वहाँ मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा। वहाँ एक युवती स्त्री खिन्न मनसे बैठी थी॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1954 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दशों → दसों