श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.5

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भक्तिज्ञानविरागाप्तो विवेको वर्धते महान्।

मायामोहनिरासश्‍च वैष्णवैः क्रियते कथम्॥ ५

bhaktijñānavirāgāpto viveko vardhate mahān|

māyāmohanirāsaśca vaiṣṇavaiḥ kriyate katham|| 5

अर्थ

भक्ति, ज्ञान और वैराग्यसे प्राप्त होनेवाले महान् विवेककी वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णवलोग किस तरह इस माया-मोहसे अपना पीछा छुड़ाते हैं?॥ ५॥✎ 1560 1561

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1560 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कलि-कालमें → कलिकालमें
  • #1561 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रसायन—अमृत-स्वरूप → रसायन—अमृतस्वरूप

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