इस प्रकार भूख-प्यासके मारे अत्यन्त दुर्बल होनेके कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिन्ता हुई और वे सोचने लगे, ‘अब मुझे क्या करना चाहिये?॥ २९॥✎ 1966
क्षुत्क्षामौ तौ निरीक्ष्यैव पुनः स्वापपरायणौ।
ऋषिश्चिन्तापरो जातः किं विधेयं मयेति च॥ २९
इस प्रकार भूख-प्यासके मारे अत्यन्त दुर्बल होनेके कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिन्ता हुई और वे सोचने लगे, ‘अब मुझे क्या करना चाहिये?॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 43) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/2/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1966 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुनाई → सुनायी