॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.2.47
सदा वैकुण्ठनिलया हरिकीर्तनतत्पराः।
लीलामृतरसोन्मत्ताः कथामात्रैकजीविनः॥ ४७
sadā vaikuṇṭhanilayā harikīrtanatatparāḥ|
līlāmṛtarasonmattāḥ kathāmātraikajīvinaḥ|| 47
अर्थ
आपलोग सदा वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं, निरन्तर हरिकीर्तनमें तत्पर रहते हैं, भगवल्लीलामृतका रसास्वादन कर सदा उसीमें उन्मत्त रहते हैं और एकमात्र भगवत्कथा ही आपके जीवनका आधार है॥ ४७॥