श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.52

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भक्तिज्ञानविरागाणां सुखमुत्पद्यते कथम्।

स्थापनं सर्ववर्णेषु प्रेमपूर्वं प्रयत्नतः॥ ५२

bhaktijñānavirāgāṇāṃ sukhamutpadyate katham|

sthāpanaṃ sarvavarṇeṣu premapūrvaṃ prayatnataḥ|| 52

अर्थ

भक्ति, ज्ञान और वैराग्यको किस प्रकार सुख मिल सकता है? और किस तरह इनकी प्रेमपूर्वक सब वर्णोंमें प्रतिष्ठा की जा सकती है?’॥ ५२॥

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