श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.55

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

त्वयि चित्रं न मन्तव्यं भक्‍त्यर्थमनुवर्तिनि।

घटते कृष्णदासस्य भक्तेः संस्थापना सदा॥ ५५

tvayi citraṃ na mantavyaṃ bhaktyarthamanuvartini|

ghaṭate kṛṣṇadāsasya bhakteḥ saṃsthāpanā sadā|| 55

अर्थ

आप भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। भगवान्‌के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है॥ ५५॥✎ 11

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #11 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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