श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.43

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

जीवच्छवोनिगदितः स तु पापकर्मा

येन श्रुतं शुककथावचनं न किञ्चित्।

धिक् तं नरं पशुसमं भुवि भाररूप-

मेवं वदन्ति दिवि देवसमाजमुख्याः॥ ४३

jīvacchavonigaditaḥ sa tu pāpakarmā

yena śrutaṃ śukakathāvacanaṃ na kiñcit|

dhik taṃ naraṃ paśusamaṃ bhuvi bhārarūpa-

mevaṃ vadanti divi devasamājamukhyāḥ|| 43

अर्थ

जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है। ‘पृथ्वीके भारस्वरूप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’—यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं॥ ४३॥

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