वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं। भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है॥ ५॥
नानाऋषिगणैर्जुष्टं देवसिद्धनिषेवितम्।
नानातरुलताकीर्णं नवकोमलवालुकम्॥ ५
वहाँ अनेकों ऋषि रहते हैं तथा देवता और सिद्धलोग भी उसका सेवन करते रहते हैं। भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताओंके कारण वह बड़ा सघन है और वहाँ बड़ी कोमल नवीन बालू बिछी हुई है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 47) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/3/5/