श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.72

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ततोऽपि दोषाः कलिजा इमे त्वां द्रष्टुं न शक्ताः प्रभवोऽपि लोके।

एवं तदाज्ञावसरेऽपि भक्तिस्तदा निषण्णा हरिदासचित्ते॥ ७२✎ 1494

tato'pi doṣāḥ kalijā ime tvāṃ draṣṭuṃ na śaktāḥ prabhavo'pi loke|

evaṃ tadājñāvasare'pi bhaktistadā niṣaṇṇā haridāsacitte|| 72

अर्थ

ये कलियुगके दोष भले ही सारे संसारपर अपना प्रभाव डालें, किन्तु वहाँ तुमपर इनकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी।’ इस प्रकार उनकी आज्ञा पाते ही भक्ति तुरन्त भगवद्भक्तोंके हृदयोंमें जा विराजीं॥ ७२॥✎ 1568

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1494 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति- स्तदा → भक्तिस्तदा
  • #1568 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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