श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.22

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

धनार्धं धर्ममार्गेण ताभ्यां नीतं तथापि च।

न पुत्रो नापि वा पुत्री ततश्चिन्तातुरो भृशम्॥ २२

dhanārdhaṃ dharmamārgeṇa tābhyāṃ nītaṃ tathāpi ca|

na putro nāpi vā putrī tataścintāturo bhṛśam|| 22

अर्थ

इस प्रकार धर्ममार्गमें उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया, तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसीका भी मुख देखनेको न मिला। इसलिये अब वह ब्राह्मण बहुत ही चिन्तातुर रहने लगा॥ २२॥

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