क्व तिष्ठामि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहयेत्।
प्राणांस्त्यजामि दुःखेन हा कष्टं मम संस्थितम्॥ ७२
kva tiṣṭhāmi kva gacchāmi ko me duḥkhaṃ vyapohayet|
prāṇāṃstyajāmi duḥkhena hā kaṣṭaṃ mama saṃsthitam|| 72
अर्थ
अब मैं कहाँ रहूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे इस संकटको कौन काटेगा? हाय! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस दुःखके कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे॥ ७२॥
क्व तिष्ठामि क्व गच्छामि को मे दुःखं व्यपोहयेत्।
प्राणांस्त्यजामि दुःखेन हा कष्टं मम संस्थितम्॥ ७२
अब मैं कहाँ रहूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे इस संकटको कौन काटेगा? हाय! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस दुःखके कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे॥ ७२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.72 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 61) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/padma/4/72/