वे बोले,‘पिताजी! यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुःखरूप और मोहमें डालनेवाला है। पुत्र किसका? धन किसका? स्नेहवान् पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है॥ ७४॥
असारः खलु संसारो दुःखरूपी विमोहकः।
सुतः कस्य धनं कस्य स्नेहवाञ्ज्वलतेऽनिशम्॥ ७४
वे बोले,‘पिताजी! यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुःखरूप और मोहमें डालनेवाला है। पुत्र किसका? धन किसका? स्नेहवान् पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है॥ ७४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.74 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 61) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/74/