श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.29

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अतः प्रेतत्वमापन्‍नो दुर्दशां च वहाम्यहम्।

वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात्॥ २९

ataḥ pretatvamāpanno durdaśāṃ ca vahāmyaham|

vātāhāreṇa jīvāmi daivādhīnaphalodayāt|| 29

अर्थ

इसीसे अब प्रेतयोनिमें पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ। अब दैववश कर्मफलका उदय होनेसे मैं केवल वायुभक्षण करके जी रहा हूँ॥ २९॥

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