श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.43

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः।

पङ्ग्वन्धवृद्धमन्दाश्‍च तेऽपि पापक्षयाय वै॥ ४३

tatra saṃśravaṇārthāya deśagrāmājjanā yayuḥ|

paṅgvandhavṛddhamandāśca te'pi pāpakṣayāya vai|| 43

अर्थ

देश और गाँवोंसे अनेकों लोग कथा सुननेके लिये आये। बहुत-से लँगड़े-लूले, अंधे, बूढ़े और मन्दबुद्धि पुरुष भी अपने पापोंकी निवृत्तिके उद्देश्यसे वहाँ आ पहुँचे ॥ ४३॥

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