श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.45

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स प्रेतोऽपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन्‍नितस्ततः।

सप्तग्रन्थियुतं तत्रापश्यत्कीचकमुच्छ्रितम्॥ ४५

sa preto'pi tadā''yātaḥ sthānaṃ paśyannitastataḥ|

saptagranthiyutaṃ tatrāpaśyatkīcakamucchritam|| 45

अर्थ

इस प्रकार वहाँ इतनी भीड़ हो गयी कि उसे देखकर देवताओंको भी आश्‍चर्य होता था। जब गोकर्णजी व्यासगद्दीपर बैठकर कथा कहने लगे, तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर बैठनेके लिये स्थान ढूँढ़ने लगा। इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठके बाँसपर पड़ी॥ ४४-४५॥

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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