श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.60

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कृमिविड्भस्मसंज्ञान्तं शरीरमिति वर्णितम्।

अस्थिरेण स्थिरं कर्म कुतोऽयं साधयेन्‍न हि॥ ६०

kṛmiviḍbhasmasaṃjñāntaṃ śarīramiti varṇitam|

asthireṇa sthiraṃ karma kuto'yaṃ sādhayenna hi|| 60

अर्थ

अन्तमें यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते हैं; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्ठा हो जाता है और अग्‍निमें जला दिया जाता है तो भस्मकी ढेरी हो जाता है। ये तीन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी हैं। ऐसे अस्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता?॥ ६०॥

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