श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.73

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम्।

संदिग्धो हि हतो मन्त्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः॥ ७३

adṛḍhaṃ ca hataṃ jñānaṃ pramādena hataṃ śrutam|

saṃdigdho hi hato mantro vyagracitto hato japaḥ|| 73

अर्थ

जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्तके इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता॥ ७३॥

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