॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.73
अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम्।
संदिग्धो हि हतो मन्त्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः॥ ७३
adṛḍhaṃ ca hataṃ jñānaṃ pramādena hataṃ śrutam|
saṃdigdho hi hato mantro vyagracitto hato japaḥ|| 73
अर्थ
जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवणका, संदेहसे मन्त्रका और चित्तके इधर-उधर भटकते रहनेसे जपका भी कोई फल नहीं होता॥ ७३॥