श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.102

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

इति च परमगुह्यं सर्वसिद्धान्तसिद्धं

सपदि निगदितं ते शास्त्रपुञ्जं विलोक्य।

जगति शुककथातो निर्मलं नास्ति किञ्चित्

पिब परसुखहेतोर्द्वादशस्कन्धसारम्॥ १०२

iti ca paramaguhyaṃ sarvasiddhāntasiddhaṃ

sapadi nigaditaṃ te śāstrapuñjaṃ vilokya|

jagati śukakathāto nirmalaṃ nāsti kiñcit

piba parasukhahetordvādaśaskandhasāram|| 102

अर्थ

शौनकजी! मैंने अनेक शास्त्रोंको देखकर आपको यह परम गोप्य रहस्य अभी-अभी सुनाया है। सब शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यही निचोड़ है। संसारमें इस शुकशास्त्रसे अधिक पवित्र और कोई वस्तु नहीं है; अतः आपलोग परमानन्दकी प्राप्तिके लिये इस द्वादशस्कन्धरूप रसका पान करें॥ १०२॥

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