इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया। कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया। फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ९०॥
ततोऽनमत्तच्चरणेषु नारदस्तथा शुकादीनपि तापसांश्च।
अथ प्रहृष्टाः परिनष्टमोहाः सर्वे ययुः पीतकथामृतास्ते॥ ९०
इसके पश्चात् नारदजीने भगवान् तथा उनके पार्षदोंके चरणोंको लक्ष्य करके प्रणाम किया और फिर शुकदेवजी आदि तपस्वियोंको भी नमस्कार किया। कथामृतका पान करनेसे सब लोगोंको बड़ा ही आनन्द हुआ, उनका सारा मोह नष्ट हो गया। फिर वे सब लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ९०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.90 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 79) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/90/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)