॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.2.33
गुंजामालाधरो गायन् वल्लवीवल्लभं मुहुः।
तदागमनतो रेजे भृशं संकीर्तनोत्सवः॥ ३३
guṃjāmālādharo gāyan vallavīvallabhaṃ muhuḥ|
tadāgamanato reje bhṛśaṃ saṃkīrtanotsavaḥ|| 33
अर्थ
तदनन्तर सबके देखते-देखते वहाँ फैले हुए तृण, गुल्म और लताओंके समूहसे प्रकट होकर श्रीउद्धवजी सबके सामने आये। उनका शरीर श्यामवर्ण था, उसपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे गलेमें वनमाला और गुंजाकी माला धारण किये हुए थे तथा मुखसे बारंबार गोपीवल्लभ श्रीकृष्णकी मधुर लीलाओंका गान कर रहे थे। उद्धवजीके आगमनसे उस संकीर्तनोत्सवकी शोभा कई गुनी बढ़ गयी। जैसे स्फटिकमणिकी बनी हुई अट्टालिकाकी छतपर चाँदनी छिटकनेसे उसकी शोभा बहुत बढ़ जाती है। उस समय सभी लोग आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो अपना सब कुछ भूल गये, सुध-बुध खो बैठे॥ ३२—३४॥✎ 1791