श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.8

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एकदा कृष्णपत्‍न्यस्तु श्रीकृष्णविरहातुराः।

कालिन्दीं मुदितां वीक्ष्य पप्रच्छुर्गतमत्सराः॥ ८

ekadā kṛṣṇapatnyastu śrīkṛṣṇavirahāturāḥ|

kālindīṃ muditāṃ vīkṣya papracchurgatamatsarāḥ|| 8

अर्थ

एक दिन भगवान् श्रीकृष्णकी विरह-वेदनासे व्याकुल सोलह हजार रानियाँ अपने प्रियतम पतिदेवकी चतुर्थ पटरानी कालिन्दी (यमुनाजी) को आनन्दित देखकर सरलभावसे उनसे पूछने लगीं। उनके मनमें सौतियाडाहका लेशमात्र भी नहीं था॥ ८॥

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