उद्धवजीने कहा—राजन्! तुम धन्य हो, एकमात्र श्रीकृष्णकी भक्तिसे ही पूर्ण हो! क्योंकि श्रीकृष्ण-संकीर्तनके महोत्सवमें तुम्हारा हृदय इस प्रकार निमग्न हो रहा है॥ २॥✎ 1792
धन्योऽसि राजन् कृष्णैकभक्त्या पूर्णोऽसि नित्यदा।
यस्त्वं निमग्नचित्तोऽसि कृष्णसंकीर्तनोत्सवे॥ २
उद्धवजीने कहा—राजन्! तुम धन्य हो, एकमात्र श्रीकृष्णकी भक्तिसे ही पूर्ण हो! क्योंकि श्रीकृष्ण-संकीर्तनके महोत्सवमें तुम्हारा हृदय इस प्रकार निमग्न हो रहा है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 993) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/mahatmya/skanda/3/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1792 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: एक-मात्र → एकमात्र